अविरल गंगा, स्वच्छ गंगा।

हिमालय की गोद से, बहती एक अविरल धार है,
प्रवेश होकर भारत में,
करती इसका सर्व श्रंगार है।
रूप विशाल इसका, ये दरिया आबाद है,
महिमा इसकी, भी अपरंपार है,
हां तभी तो,
' गंगा ' भारत की शान है।

बनारस के तट से, 
ऋषिकेश की पावन भूमि पर,
ये निरंतर प्रवाहमान है।
दर्शन पाने को इसके, 
कई मीलों की कतार है।
ये आस्था और श्रद्धा का सर्वोच्च स्रोत है,
तो कहीं मन के मंदिर में,
ये सर्वदा विद्यमान है।

प्रदूषित कर दे इसे,
क्या इतना बुरा इंसान है?
जो जल जीवन का निवास, और लोगों की प्यास है,
प्रदूषित कर दे इसे,
क्या इतना निर्दयी इंसान है?
जो किसी के खेत की जान, जिससे बिजली का भी उत्पाद है,
प्रदूषित कर दे इसे,
क्या इतना पापी इंसान है?

ऐसी हालत में देख गंगा को,
बड़ी शर्म मुझे आती है,
कैसे निर्मल बहने वाली,
आज गंदगी में नहाती है।
जिसने सदियों से इतना लाभ दिया,
अपना पवित्र जल हमारे नाम किया,
तो क्यों,
ऐसा दुर्व्यवहार हमने इसके साथ किया?

अगर आज भी हम प्रण लें,
गंगा को स्वच्छ बनाना है,
पुन: इसे साफ़ कर,
हमें गंदगी को हटाना है।
आखिर,
इतना कुछ किया इसने,
हमे थोड़ा तो कर दिखाना है।

हां, हमें वो इतिहास दोहराना है।।
                  

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