तो हम क्यों ना एक हैं?!
ना बंट पाई इंसानियत धर्म से,
तो बांट दिया हमें जात में।
ना मिटा पाए हमारा साथ तो,
थमा दी जात की कड़ियां हमारे हाथ में।
आज़ाद हुए ही हम कब,
जब हमारे ही सौ रंग थे,
जैसे बांट दिया हो इस देश के हर अंग को,
क्या धर्म के ये असंख्य भेद कम थे?
ना करो घमंड इस जात का,
ये बनावट तो है सामान सा,
हो जाएंगे दफ़न किसी दिन को इसी मिट्टी में सब,
है अभिमान फिर तुम्हें किस बात का?
अंबर भी एक है, है धरती भी एक,
तो है फिर क्यों हमारी पहचान अनेक?
है तो हमारा ईश्वर भी एक ही,
तो है ना क्यों हर इंसान एक?
ना झुक जाएगा सम्मान हमारा,
ना, आ जाएगा प्रलय,
हम जो सब प्रण कर लें,
कि अब ना सौ धर्म होंगे और ना होगा जातिभेद,
बस एक इंसानियत होगी और होगा हर इंसान का मेल।
Mast bro
ReplyDeleteThank you.
Deletekhatarnak bro👍👍
ReplyDeleteGadar hai
DeleteBadiya bhai
ReplyDeleteThank you.
DeleteWooooooow bee ❤️🤩
ReplyDeleteThank you.
DeleteVery nice. Keep it up
ReplyDeleteThank you.
DeleteAwesome bhaiya....u rock ......keep writing!!!
ReplyDeleteThank you.
DeleteAchi hai kavita bro
ReplyDeleteThank you.
DeleteBahut Sahi Re launde................Keep Up The Track,
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